Saturday, 19 September 2015

करब जनी फील.....

बहुत दिन पहले की बात है भी ,नहीं भी....तब लोग इतने झूठ न बोलते थे...बनारस रहते तो बनारस ही बताते,मुगलसराय नहीं..एक रुपया का समोसा और एक रुपया का चाय मिल जाता था...बुनी बरखा आंधी पानी जाड़ा गर्मी समय से आता जाता था...बिजली अभी ठीक से समाजवादी न हुई थी..न ही किसी बीटेक धारी ने कभी चपरासी के लिए किसी सचिवालय में  आवेदन किया था.न ही लोग स्मार्ट  हुए थे।
लेकिन ये कह सकते हैं की चिट्ठी के दिन लदने   शुरु हो गए थे..
दस पनरह साल पहले गाँव में जिनके घर टीवी और टेलीफोन थे वो अपने आप को धीरूभाई अम्बानी के सगे समधी समझते थे..ले देकर  गाँव में   एक दो लैंडलाइन हुआ करता था....किसी बड़का राय साहेब के दुआर पर बड़का एंटीना लगता था ...ये अलग बात है की पांच साल बाद टेलीफोन बिल न जमा करने के कारण बीएसएनएल वाले उनका तार और एंटीना सब उखाड़ ले जाते..लेकिन टेलीफोन लगाते ही दूर से लोग समझते थे.."अरे बहुत पैसे वाले हैं..".भौकाल टाइट था...उनके यहां फोन की घण्टी बजती कि पूरा टोला मोहल्ला जान जाता था "अरे फोन आइल बा"
अभी बाहर बाजार में  कदम कदम पर पीसीओ क्रान्ति चल रही थी..हाल ये था की आजकल जो मेडिकल स्टोर  पर डाक्टर साहब लोग रिचार्ज कूपन बेच रहे हैं वो उस जमाने में पीसीओ चलाते थे...आज जो पीएचडी धारक बेरोजगार उत्तर प्रदेश सचिवालय में चपरासी बनने के लिए तरस रहे हैं..वो उस समय पीसीओ खोलने के  बारे में सोचते थे.....जगह का चयन करने के लिये भारी रिसर्च करते कि  कहाँ खोला जाय की पीसीओ चउचक चले....
तब साहेब एक मिनट का दो रुपया लगता था..लोकल एसटीडी की परिभाषा के साथ अभी किसी एयरटेल वोडाफोन ने छेड़छाड़ नही किया था..मने मान लीजिये बलिया जिला के रेवती गाँव का आशिक खेदन गाजीपुर अपनी भइया की ससुराल गया...उहाँ मझीली साली से सताइस बार "जीजा...ए जीजा" सुनकर  उसका दिल धड़कने लगा...मने जीजा जीजा सुनने के लिये बेचैन रहने लगा ..यहाँ तक कि गाँव लौटकर उदास रहने लगा...तरह तरह के सपने आने लगे...आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा... तो गुप्त रोग विशेषज्ञ हकीम एम जान इस लक्षण को लभेरिया की शुरुवात बताने लगते थे..
"प्यार का इलाज नही हाय रब्बा" टाइप फिलिंग लेकर..उस जीजा मटिलगनू को गाजीपुर वाली साली  से टेलीफोनिक  बात करने के लिये अपने बाबूजी के पाकेट से बिस रुपया चुराने के बाद चार किलो अरहर का दाल भी बेचना पड़ता थ...क्योंकि  ये दूरी एसटीडी काल रेट के अंतर्गत आती थी...
प्यार की ये छोटी सी दूरी लोकल से एसटीडी हो जाया करती थी.... केमिकल लोचा में एसटीडी का लोचा प्यार करने वाले गरीबों पर किसी सितम से कम न था...
तीस पर फोन करने के लिए मन्नत मांगनी पड़ती थी...बरम बाबा काली माई डीह बाबा को बुलाना पड़ता था...बीएसएनएल की एक  चिर परिचित मोहतरमा अपनी स्वीट स्वीट सी आवाज में कहतीं.."इस रूट की सभी लाइने व्यस्त हैं कृपया थोड़ी देर बाद डायल करें.." तो लोगों का दिल धक्क से हो जाता था..
बेचैनी महंगाई की तरह बढ़ने लगती थी...कभी कभी प्याज जैसा मुंह बनाकर रोना भी आता था..भाग्य संजोग से लग भी जाता  तो उधर कहना पड़ता .."की तनी रजेस के पापा को बोला दीजिये हम उनकर मम्मी बोल रहे हैं..एक घण्टा  बाद करेंगे.."
राजेस के पापा को खबर भेजा जाता..उ दौड़कर आते और आकर इंतजार करते... फोन आता तो रजेस के मम्मी से बात होती.....
आ चार मिनट बाद राजेस के मम्मी कहतीं..".ठीक बा रखत बानी..सोलह रूपया हो गइल."
फोन कटने के बाद रजेस के ममी पापा का मुंह उदासी से घिर जाता था...उनका दुःख दर्द तबके गीतकार लिखते...गायक गाते..जीप बस टेम्पो में लेतरि खेसारी कल्लू कल्पना नही थे ..न ही गीतों में चोली हुक..कभर आ करुआ तेल था..ना ही रतिया कहाँ बितवल ना दूर दूर तक सुनाई देता था...बस भरत शर्मा विष्णु ओझा गाते और गोपाल राय बजते थे....
"ढेर बतिआवला प इहाँ तीले तीले तील
देखीं बील उठता
"रउरा करब जन फील.. देखी बिल उठता.."
मने बड़ी दुखद हालात थे....टैरिफ वाउचर सेंड डिलीट रिचार्ज इनबॉक्स आउटबॉक्स आदि शब्दों से लोग दो चार न हुए थे...लेकिन कई प्रेम कहानियाँ रोमांस से सैड मोड इसलिए चली जातीं कि पिंकी से  बात करने के लिए पिंटू फोन करता और पता चलता बात करने के लिये पिंकी के  बाबूजी सिरिकिसुन सिंग पहुँच गए हैं....
इन्हीं सिरिकिसुन  टाइप बाप जी लोगों ने मेरे चार पांच मित्रो की सर्फ एक्सल लगाकर इज्जत की धुलाई इसलिए  किया कि उनके और उनकी बेटी की बातचीत दूसरे वाले चोंगे से उन्होंने सुन लिया था...
ट्रेजडी की इन्तेहाँ नहीं थीं.....
अभी अभी उसी मित्र में से एक ने अपने स्मार्ट फोन से अपनी चौथी गर्लफ्रेंड को काल करके कहा है कि व्हाट्स अप पर ऑनलाइन आवो डार्लिंग ...तब तक उसकी तीसरी गर्लफ्रेंड ने उसके दूसरे फोन पर काल करके कहा है कि "कल मैं जोधपुर वाली मौसी से बात कर रही थी यार तुम शक न करो...."
इसने मुझसे कहा है की यार मैं शक क्यों करूँ.."मैं ही कौन सा शरीफ हूँ यार"
मैं हंसा हूँ और नही भी हंसा हूँ......वो बहुत हंसा है अपनी स्मार्टनेस पर...
सच में कितनी स्मार्टनेस बढ़ गयी है..एक साथ इतने लोगों के साथ आदमी प्यार कर सकता है....
अरे कायदे से बीएसएनएल वाली मोहतरमा को संगीत नाटक आकदमी पुरस्कार दे देना चाहिए.....कभी दीवानों की बेचैनी बढ़ाने वाली उनकी आवाज ने उस समय प्रेम को जिन्दा तो  रखा था..
आज लौंडे एक ही साथ व्हाट्स अप पर पहली वाली से  बात करते हैं...स्काइप पर दिल्ली वाली से..फेसबुक पर अमेरिका वाली से ,यूनिनार पर गाँव वाली से और लाइन वाइबर पर कालेज वाली से....
क्या कहें बस ये  बहस तो  चलती रहनी चाहिए की लोग तब स्मार्ट थे या अब स्मार्ट हैं।। ??

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