Tuesday, 11 March 2014

भिखारी प्रेम

इधर कमबख्त जीवन का बाइसवां बसंत बीत रहा है। होली की तैयारियों का खाका खिचां जाने लगा है। इस साल कुछ नई भौजाइयों की संख्या में श्रीवृद्धी हो गई है:)। तन मन फागुनी उमंगो से पगा है। कभी कभी फगुवा गाने का मन करता है तो कभी धमार सुनने का मन करता है तो कभी बसंत पर किसी सुप्रसिद्ध कवि की कविता पढने का मन करता है।
आज यूँ ही मस्ती में अस्सी घाट से चले आ रहे थे, तो एक हिन्दी के शोध छात्र (जो नाटक पर शोध कर रहें हैं) ने ये कह के रंग में भंग डाल दिया की भिखारी ठाकुर के गीतों के साहित्य में दम नही है ,भले उनके नाटक के कथ्य मजबूत हों ,वो भोजपुरी के शेक्सपियर कहें  जायें ,पर उनके गीतों में वो बात नही है ,जितना उनको महिमा मंडित किया जाता है।
हम बायें हाथ से कपार पिटे...... मन ही मन यू जी सी को दो चार अस्सी घाट वाली.......... सुनाये "की यूँ ही रेवड़ियो की तरह जूनियर रिसर्च फेलोशिप बांटते गये न...... तो भगवान ही मालिक हैं।
हम क्या कहते उनसे .....कलाकार बनने की प्रक्रिया में हैं अभी तो भिखारी से अगाध प्रेम करतें हैं रहा न गया। बस इतना ही कहा की माननीय हम आपसे 8 साल छोटें हैं और कहाँ गाना बजाना करतें हैं आप शोध छात्र हैं साहित्य की समझ पर आपका एकाधिकार स्वभाविक है।
बुरा न मानियेगा अभी आपको भिखारी ठाकुर को ठीक से पढने की जरूरत है
कल को प्रोफ़ेसर होंगे आप ।ये बात अपने किसी छात्र से मत कहियेगा बंधू
उन्होंने मुझे थोडा उपर नीचे देखा... मेरी बातो पर उनका संशय भी ठीक ही है आखिर मेरी क्या मजाल की एक शोध छात्र को समझा दूँ।
दोस उनका भी नही सच तो ये है की भिखारी की पूरी आलोचना अभी बाकी है भाई। इधर कुछ मार्क्सवादी आलोचकों ने मात्र उनको जनवादी नाटककार , कलाकार ही घोषित किया हुआ है। वो तो भला हो इधर कुछ ने भिखारी में जर्मन कवि और नाटककार ब्रेख्त की तलाश कर ली है की दोनों की शैली एपिक थिएटर वाली थी।
पर भिखारी में अभी बहुत कुछ मिलना बाकी है। मुझे लगता है की उनके नाटको को जिस दिन मार्क्सवादी चश्मा हटा के पढना शुरू किया गया न उस दिन भिखारी कबीर और जायसी के सामने हसंते हुये खड़े मिलेंगे और उनके विदेसिया को पदमावत के सामने रखा जायेगा।
बहरहाल हमने माननीय शोध छात्र जी को एक छोटा उदाहरण गबरघिचोर से दिया। और बसंत पर कविता पढने की तमन्ना भी पूरी कर ली।
जब गलीज अपनी ब्याहता को घर बैठा के बाहर चला जाता है इधर गडबडिया के गडबड करने से एक बेटा जन्म लेता है कोई शहर में जाके गलीज से कह देता है की गलीज तोहरा बेटा भइल बा
गलीज अपना बेटा लेने गाँव आता है ।
उसकी विधवा सरीखी पत्नी जब उसे देखती है तो उसकी प्रसन्नता को भिखारी लिखतें हैं।
"कमल उछाह जैसे सुरुज प्रकाश होत
कुमुद उछाह जैसे चन्द्रमा हरसते
भौरन उछाह जैसे आगमन बसंत जानी
मोरन उछाह जैसे बरखा बरसते
हंसन उछाह जैसे मानसरोवर बीच
साधन उछाह.........................
सबके उछाह एहीं भातीं उर होत रहे
हमरे उछाह स्वामी तोहरे दरसत

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