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Wednesday, 10 February 2016

ए हो लभ लेटर के पाना...........

मेरी प्यारी पिंकी....
वेलेंटाइन बाबा के कसम.इ लभ लेटर मैं सरसों  के खेत में  नहीं तुम्हारी मुहब्बत के टावर पर चढ़कर लिख रहा हूँ...डीह बाबा काली माई के कसम आज तीन दिन से मोबाइल में टावरे नहीं पकड़ रहा था...ए पिंकी. खीसियाना मत... मोहब्बत के दुश्मन खाली हमारे तुम्हारे बाउजी नहीं यूनिनार आ एयरसेल वालें भी हैं..जब फोनवा नहीं मिलता है न रतिया को तो मनवा करता है कि सड़की पर दउड़ दउड़ कर जान दे दें....अरे इन सबको आशिक़ों के दुःख का क्या पता रे?.हम चार किलो चावल बेच के नाइट फ्री वाला पैक डलवाये  थे...लेकिन हाय रे वेलेंटाइन.. रोज डे निकस गया प्रपोज डे बीत गया आज टेडी डे चला गया..हम तुमको हलो भी नहीं कह पाये।
कभी कभी तो मन तो करता है की चार काठा खेत बेचकर एक दुआर पर टावर लगवा लें..आ रात भर तुमसे इलू इलू करें।
जानती हो आज रहल नही जा रहा था एकदम..मनवा एतना  लभेरिया गया है कि  एकदम बेचैनी लेस दिया था...इधर बाऊजी अलगे परसान किये हैं...माई अलगे नोकरी करने के लिए खिसिया रही है....कल आलू में दवाई छिड़कना है.. मटर में पानी चलाना है..सांझी को गेंहू पीसवाना है नाही तो  माई बेलना से मारके सब बेलनटाइन निकास देगी... फेर चना के खेत घूमना है.ईख भी पेरा रहा था..गुड़ बन रहा था...एकदम तुम्हारी बातों जइसा मीठा...
तुमको पता है जब जब सरसो का खेत देखता हूँ न तब तब तुम्हारी बहुते याद आती है..
लगता है तुम हंसते हुए दौड़कर मेरे पास आ रही हो....मन करता है ये सरसों का फूल तोड़कर तुम्हारे जूड़े में लगा दूँ..आ जोर से कहूं..."आई लव यू पिंकी"...
अरे अब गरीब लड़के कहाँ से सौ रुपया का गुलाब खरीदेंगे?....जानती हो हवा एकदम फगुनहटा बह रही है मटर,चना जौ के पत्ते सरसरा रहे हैं...रहर और लेतरी आपस में बतिया रहे हैं.....मन  करता है खेत में ही तुम्हारा दुपट्टा बिछाकर सो जाऊं आ सीधे होली के बिहान उठूँ....बाकी तुम्हारे उस बाउजी के अमरिसपुरिया जइसन फेस देखकर ऐसा लगता है जैसे सरसो के खेत में साँड़ घुस आया हो..मनवे बीजूक जाता है।
छोड़ो..उस दिन तो बबीतवा के बियाह में तुम आई थी न..हम देखे थे..तुम केतना खुश थी...करिया  सूट में एकदम गुलाब जामुन जैसा लग रही थी...तुमको पता है तुमको  देखकर हम दू घण्टा नागिन  डांस किये थे।
ए पिंकी अच्छे से रहना..अब तुम्हारा 18 से परीक्षा भी है....नीमन से पढ़ना..बाकी हम खिड़की पर खड़े होकर नकल करवाने के लिये ज़िंदा हैं न....चिंता मत करना ..बस काका आ विद्या का गाइड खरीद लेना....
इ खाली तुम्हारे इंटर का परीक्षा नहीं पिंकी मेरे इश्क का इम्तेहान भी है।
अकलेस भाई आ मोलायम सिंग के कसम कवन उड़ाका दल रोक लेगा सरवा...।
बाकी सब ठीके है...रात दिन तुम्हारी याद आती है.पागल का हाल हो गया है.....रहा नहीं जा रहा..अब खेती का काम करके हमू जल्दी से दौड़ निकालेंगे ...तेरह को बनारस में भरती है.देखो बरम बाबा का आशीर्वाद रहा तो मलेटरी में भरती होकर तुमसे जल्दी बियाह करेंगे...
हम नहीं चाहते की तुम्हारा बियाह किसी बीटेक्स वाले से हो जाए और हमको तुम्हारे बियाह में रो रोकर पूड़ी पत्तल गिलास चलाना पड़े...
आई लभ जू रे पिंकी। .कल दू बजे मातादीन रा के टिबुल पर आ जाना..आई मिस यू..एगो गाना गाने का मन कर रहल है।
"ए हो ब्यूटी के खजाना बाड़ू लभ लेटर के पाना
मनवा लागे नाहीं जबसे दीदार भइल बा
ए जान हो तोहरा से प्यार भइल बा।।
                  तुम्हारे पियार में हमेशा से पागल
                               मंटुआ                                                                                                                                                                                                                                                                                            ये भी जरुर पढ़ें मजा आएगा .....पिंकीया का जबाबी लेटर....मेरे जानेमन मंटू                                                                                                                                                                                                                                                                           ए मंटू पिंकीया आज पास हो गयी रे                                                                                                                समाजवादी सुहाग रात योजना                                                                                                                       कामरेड कथा - लव, सेक्स और क्रान्ति                                                                                                        

Thursday, 20 August 2015

ये मेरा प्रेम पत्र पढ़के......

"खत लिखता हूँ खून से स्याही न समझना
आपसे करता हूँ प्यार बेवफाई न समझना"
जिस दिन प्रेम पत्र लेखन भी कविता,कहानी
संस्मरण,डायरी और रिपोतार्ज कि तरह साहित्य की विधा घोषित होगा ,उस दिन हिंदी साहित्य शायद ज्यादा समृद्ध होगा...घर घर पुरस्कृत लेखक और पाठक न मिलने लगें तो कहियेगा..मुझे उसका साहित्य अकादमी मिल जाए तो भी आश्चर्य न करियेगा........या कभी पम्मी का मोनू से और पिंकी का पप्पू से मामला सेट कराने के लिये उत्तर प्रदेश की असमाजवादी सरकार  प्रेम पत्र लेखन का नारायण दत्त तिवारी  पुरस्कार मुझे 30% कमीशन लेकर दे दे..तो कृपा करके आहत न होइयेगा....क्या है कि बाइस वर्षीय जीवन में प्राप्त उपलब्धियों में एक ये भी है कि हम नब्बे के दशक में सिद्ध प्रेम पत्र लेखक और पत्र वाहक रहें हैं...जिसका भी पत्र लिखा उसका प्रेम सफल हुआ..उस छोटी सी उमर में प्रेम किस  उल्लू का नाम है ये तो पता नहीं था ,पर लक्ष्मी जी की मेहरबानी से एक पत्र का एक रुपया जरूर मिल जाता था।
उस एक रुपया के लिये बड़ी बड़ी मेहनत करनी पड़ती थी।
पत्रों की भाषा प्रांजल और अलंकारपूर्ण रहे ताकि प्रेम प्रस्ताव तुरन्त स्वीकार हो....लक्षण,अभिद्या,और व्यंजना सही जगह सेट रहे कि हाई स्कूल में थर्ड डिवीजन प्रेमिका भी अपने बारहवीं फेल प्रेमी को हिंदी का पीएचडी होल्डर समझे......सब सोचना पड़ता था।
या प्रेमिका के तारीफ़ का पुल बाँधते समय भले किसी मायावती को मोनालिसा कहना पड़े या ममता को माधुरी ये सबकी चिंता मुझे उस नाजुक सी उम्र में करनी पड़ती थी....
प्रलय नाथ गुंडा स्वामी की सगी बहन जैसी दिखने वाली लड़की के  रूप लावण्य के बखान में ये बताना पड़ता था कि
"तुम सड़ी हुई जलेबी की तरह नहीं एकदम ताजा रसदार लौंगलता की तरह लगती हो....चलती हो तो धरती नहीं हिलती ऐसा प्रतीत होता है मानों बिरजू महराज झपताल की आमद प्रस्तुत करने जा रहें हों..तुम अमरीशपुरी की तरह नहीं बिल्कुल काजोल जैसी हंसती हो.....तुम्हारा ये शाहरुख खान किसी दिन बैलगाड़ी के नीचे लेटकर जान दे देगा मेरी जान....आई लव यू"
फिर तो साहेब कैसे पत्र को सकुशल जगह तक पहुँचाया जाए इसका भी लोड मेरे ही कपार पर था....अलग बात है की पहली बार पिंकी को खत देना था तो उसकी मम्मी को दे दिया कि "पिंकी को दे देना पूरुब टोला के  पप्पू ने दिया है..फिर पता नहीं पिंकी और पप्पू का क्या हुआ....पर मेरी धुलाई सर्फ एक्सल लगा के हुई.....उस दिन ज्ञात हुआ कि प्रेम करना और प्रेम पत्र लिखना दोनों इस देश में गैर कानूनी काम है...और इस गैर कानूनी काम में सहयोग करने पर आईपीसी कि वो धारा लगती है जिसमें घर वाले चप्पल और जूता से मारते हैं....
लेकिन साब जी...अक्सर लगता है कि मेरे लेखकीय गुण का प्रार्दुभाव वहीं से  हुआ हैं
वो दौर याद आता है तो खूब हंसी भी आती है और खुद की मासूमियत पर तरस भी...
उस 1g के जमाने में   कब किसी राह चलती पिंकी के प्यार में किसी पप्पू का केमिकल लोचा  उलझ जाए ये ठीक नही था .
प्यार में आदमी पप्पू हो जाता है...फिर जेठ के दुपहरिया में पुल पर खड़े होकर लम्बा इतंजार करना.....अँखियों से दिल का हाल समझाते समझाते.जताते जताते एक आध साल तो बीत ही जाते थे...कंफर्म करना पड़ता था की देखकर हँसने पर हँसती है की नहीं...गर हँसती है तो खत कब लिखा जाये..उसमें क्या लिखा जाये कि मामला उधर स्वीकार्य हो जाय...उसकी गली में फेंका जाय की छत पर  या उसकी सहेली को दिया जाये.....बड़े चोंचले थे........तीस पर लौंडे का आधा प्यार तो तभी खत्म हो जाता  कि कहीं पकड़ा गए तो घर वाले लाठी पर जमी धूल को उसकी पीठ पर साफ़ देंगे....इज्ज़त का ईंधन जलकर धुंआँ -धुआँ हो जायेगा।
थोड़ी हिम्मत बढ़ाने पर ये चिंता कि खून से लिखे की स्याही से? इसलिए उस समय के प्रेम पत्रों के मजमून इसी टाइप के शेर से स्टार्ट होते थे...
लिखता हूँ खून से स्याही न समझना
आपसे करता हूँ प्यार बेवफाई न समझना।

उस वक़्त पढ़ने वाला भी आँख से नही दिल से पढ़ता था......पत्रों में बार बार यही दोहराया जाता कि मैं तुम्हे जान से ज्यादा प्यार करता हूँ....और तुम ही मेरी जान हो.....उस बालावस्था में मुझे बड़ा वाला कनफ्यूजन क्रिएट  हो जाता कि साला ये असली जान कौन है..?
फिर कुछ महीने बाद  बोध हुआ की अगिया तो दोनों तरफ ही लगती है..ये अलग बात है  की लौंडे बेचारे पहले बदनाम हो जातें हैं.... इसका तब ज्ञान हुआ जब ,जबाबी खत चोरी से खोल के पढ़ा....जिसमें किसी ज्योति ने अपने दीपक को प्यार के अँधेरे में बैठकर लिखा था..
"सोने की साइकिल कलम का पहिया
हाय मेरे राजा मिलोगे कहिया" ?
तब तो पढ़कर आह निकल गयी....
दीपका ने भी मुझसे कहा की लिख दो "शनीचर को आठ बजे राति खाने मातादीन राई के टिबुल पर आना....."
हमने लिख दिया इस अंदाज में मानों गनेस जी वाल्मीकि जी के सामने बैठकर जनक वाटिका प्रसंग लिख रहें हों।
लेकिन  ये भी समझ नहीं थी कि ई साला रात को आठ बजे कौन सा पेयार होता है.....?
फिर पता न ज्योति और दीपक ने आठ बजे कौन सा प्यार किया...
लेकिन ये जरूर पता चला कि अब ज्योति का घर से बाहर आना जाना बन्द हो गया है..
सो अब खतों के शेर ग़हरिले भाव वाले हो गए..
"आज रविवार है मैं कपड़ा धो रही हूँ
साजन तेरे याद में छुप छुप के रो रही हूँ"
फिर हमेशा हंसने वाले दीपका को इतना मुरझाये मैंने कभी नहीं देखा...उहो खूब रोया....
और आँशु पोछकर कहा की लिख दो अतुल...
"टूटी हुई सुई से कढ़ाई नहीं होती है
डार्लिंग तेरे याद में पढ़ाई नहीं होती है"
तब पता चल की ओ......साला प्यार में रोया भी जाता है..
ऐसे ऐसे  किस्से हैं की आज उपन्यास लिख दूँ।
हाँ मैंने कभी किसी को अपनी ओर से खत नहीं लिखा...क्योंकि 2g के दौर में जवान हुआ..तब हाथों हाथ मोबाइल हो गए थे...
लेकिन जब भी इन खतों को पढ़ने पढ़वाने और लिखवाने वालों के चेहरे याद करता हूँ तो बड़ा अफ़सोस सा हो जाता है.....वो लौंडे प्रेमिका का पत्र पाकर इस अंदाज में उछलते थे मानों रियो ओलम्पिक का लम्बी कूद में भारत का प्रतिनिधित्व यही करेंगे...
वो खत को तकिये के नीचे रखकर सोना...सामने वाली जेब में रखकर बार बार पढ़ते हुए बेवजह हंसना....खत के इंतजार में घण्टो खड़े रहना.. अब दुर्लभ सा हो गया है।
वो जमाने नहीं आएंगे...हम चाहकर भी नहीं जा सकते न ही जाना उचित है....लेकिन इस whats app और फेसबुक के जमाने में.वो बेचैनीयाँ खत्म हो चुकी हैं....कहाँ से कहाँ आ गए..... सोचने पर लगता है अब कितनी सुविधा है....पर  अब वो शिद्दत और सदाकत मर गयी है...
आज कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को रोमांटिक सा मैसेज भेजे तो प्रेमिका शक्ति कपूर जैसा मुंह बनाकर कहेगी...
"पहले ये बतावो की तुम्हें किसने भेजा था"?
लो अब जज़्बात भी नकली लगने लगें हैं..उसका दोष भी नहीं....लौंडा एक ही साथ एक ही मैसेज को 28लोगों को फॉरवर्ड कर देता है.....क्या करे।
अब न वो खत  है और न ही वो प्रेमी... सब कुछ इतना फास्ट हो गया है की..साल भर में दो दो चार चार ब्रेक अप तो हो ही जातें हैं..
लौंडे प्रेम कहीं और करते हैं...आई लव यू कहीं और बोलते हैं...आर्गेज्म कहीं और महसूसते हैं...लड़कियां भी ये बताने में शान समझती हैं की कितने लौंडे उनके प्यार में पागल होकर जलेबी छान रहें हैं...
इस प्रेम के संकीर्ण काल में प्यार महज प्यार नहीं व्यापार हो गया है और आई लव यू महज जुमला।
कभी महान चित्रकार वान गॉग ने कहा था की "प्रेम जीवन का नमक है" ओशो कहतें हैं.."प्रेम आत्मा का भोजन है"
लेकिन "हाफ गर्लफ्रेंड" को सिरहाने रखकर सोने वाली पीढ़ी को देखकर समझ में नहीं आता की इस भोजन में नमक कितना है।।
अरे आज प्रेम में प्रेम को बचा लेना ही बड़ी उपलब्धि होगी.. बस इसके लिए खुद ही सुधरना होगा क्योंकि इसको बचाये रखने के लिए कोई एप्प और कोई साफ्टवेयर नहीं आयेगा.. याद रखना होगा की इमोशन सेव नहीं किये गए तो रिलेशन अपने आप डिलीट हो जाएंगे।

Thursday, 13 November 2014

चिठ्ठी लिखत बानी बाकी तार बुझिहा

एक जमाना था कभी....
शाम को तीन बजते ही दरवाजे पर डाक का इंतजार...छत पर कौवा कांव से बोला नहीं की लोग ये मान लेते थे कोई आ रहा है.....खाना खाते वक्त यदी हिचकी भी आ गयी तो लोगों को विश्वास हो जाता था कि कोई याद कर रहा है.......
गाँव जवार में चिट्ठी पत्री लिखने पढ़ने वाले कुछ ही लोग थे......
अपनी सब बात लिखने के बाद लोग ये एक लाइन का पतंजलि सूत्र जरुर लिखते थे.....
"थोड़ा पढ़ना ज्यादा समझना"
और ठेठ देहाती  में.........
" लिखत बानी चिट्ठी बाकी तार बुझिहा
"भइया के कुशलता के कामना करते हुए डीह बाबा से मनावत बानी की तुहूँ कुशल से होखबा....भंइसिया बियफे के पाड़ा बिआइल बिया......किसुन चचा के फेनुसा दियात रहे त लेबे ना कइलन.....
आ अगहन में कुछ पइसा भेज दिहा ह....भउजी के नया समाचार बा....परसों के रजवा लउकी तुरत घरी छत प से गिर गइल बा......बाकी सब ठीक ।खाए पिए प धेयान दिहा...कुछ के चिंता न कइनी शिव जी बानी नू।
जो गाँव के मजनू छाप आशिक जिनको  लभलाइटिस हो गया था...वो आठ आना के लेटर पैड पर हाथ से नहीं साहेब....करेजा से लिखते थे.....
"हमार जान तहरा पियार में पागल होकेे बगइचा बगइचा घूमत बानीं...
तहरा सिवा कुछ लउकते नइखे...हमार करेजा तुही बाडू त दुनिया में अंजोर बा..ना त पूरा दुनिया में दिनहीं अन्हार हो जाइत......
सुक के सांझी खा ललन रा के टिबुल प आ जइहा... इंतजार करम....तहरा परेम में पागल....तहार  फलाना।।
लास्ट में दिल और बड़ा सा तीर बना के आई लभ यू..सुनयना...
पर दुःख की बात कई बार ऐसा भी हुआ कि किसी भाई को चिट्ठी अगहन बाद मिली और किसी सुनयना को सुक बीत जाने के बाद...
फिर अगहन और सुक का इंतजार करने वालों का दुःख बताने के लिए करेजा चाहिए.....लेकिन उनका प्रेम कम न हुआ।
आज तो हम थ्री जी और वाई फाई युग में हैं...एक क्लीक पर सारी दूरियाँ खतम....पर एक जगह है जहाँ दूरी इतनी ज्यादा बढ़ गयी है जिसकी भरपाई दुनिया की कोई टेक्नोलाजी नहीं कर सकती.....लोग अब ज्यादा अंतरमुखी हो गयें हैं.....
कल एक मित्र के साथ उनके दरवाजे के बाहर बैठा था....तो उन्होंने कहा खाना खा लेतें हैं अतुल...हमने कहा बड़ा जल्दी बना दिया भउजी ने भाई...उन्होंने कहा भाई अभी whats app पर मैसेज किया है आकर खा लो वरना जोधा अकबर का टाइम हो गया है।....हमने कपार पीट लिया।
कितना अच्छा होता न वो दरवाजे पर आकर एक बार बोल जातीं..."सुनतें हैं खाना खा लिंजिये" तो कसम से आधी भूख तो अइसे ही मिट जाती।
पर क्या कहें दोस उनका नहीं...
सारे रिश्ते आज टेक्नोलाजी के तार से बंधे हैं....नेह की डोर कहीं टूट सी गयी है।
पहले लोग मिलते ही हाल चाल पूछते थे....आज ज्यादा लोग यही पूछ्तें हैं आप फेसबुक और whtas app पर हैं ?.और मजे कि बात...आप लाख स्मार्ट हों पर कसम पाकिस्तान के पप्पू की आज आपके पास स्मार्ट फोन नहीं है तो आपको इस तरह लोग देखतें हैं....
मानो  घर के कूड़े घर में पड़े वी सी आर को देख रहें हों.....
क्या कहें हमारे समय की बड़ी विडंबना है... इस पर जितना कहा जाय कम ही होगा।
आज समय के साथ कदम ताल मिलाना जरूरी है.. फेसबुक न होता तो हम ये बात अपने  सात सौ मित्रों से कैसे कह पाते.....?
लेकिन लाख क्रान्ति हो जाय....चिट्ठी वाली फिलिंग को बचाकर न रख पाए...तो आदमी से पत्थर होते देर न लगेगी।

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