Thursday, 20 August 2015

ये मेरा प्रेम पत्र पढ़के......

"खत लिखता हूँ खून से स्याही न समझना
आपसे करता हूँ प्यार बेवफाई न समझना"
जिस दिन प्रेम पत्र लेखन भी कविता,कहानी
संस्मरण,डायरी और रिपोतार्ज कि तरह साहित्य की विधा घोषित होगा ,उस दिन हिंदी साहित्य शायद ज्यादा समृद्ध होगा...घर घर पुरस्कृत लेखक और पाठक न मिलने लगें तो कहियेगा..मुझे उसका साहित्य अकादमी मिल जाए तो भी आश्चर्य न करियेगा........या कभी पम्मी का मोनू से और पिंकी का पप्पू से मामला सेट कराने के लिये उत्तर प्रदेश की असमाजवादी सरकार  प्रेम पत्र लेखन का नारायण दत्त तिवारी  पुरस्कार मुझे 30% कमीशन लेकर दे दे..तो कृपा करके आहत न होइयेगा....क्या है कि बाइस वर्षीय जीवन में प्राप्त उपलब्धियों में एक ये भी है कि हम नब्बे के दशक में सिद्ध प्रेम पत्र लेखक और पत्र वाहक रहें हैं...जिसका भी पत्र लिखा उसका प्रेम सफल हुआ..उस छोटी सी उमर में प्रेम किस  उल्लू का नाम है ये तो पता नहीं था ,पर लक्ष्मी जी की मेहरबानी से एक पत्र का एक रुपया जरूर मिल जाता था।
उस एक रुपया के लिये बड़ी बड़ी मेहनत करनी पड़ती थी।
पत्रों की भाषा प्रांजल और अलंकारपूर्ण रहे ताकि प्रेम प्रस्ताव तुरन्त स्वीकार हो....लक्षण,अभिद्या,और व्यंजना सही जगह सेट रहे कि हाई स्कूल में थर्ड डिवीजन प्रेमिका भी अपने बारहवीं फेल प्रेमी को हिंदी का पीएचडी होल्डर समझे......सब सोचना पड़ता था।
या प्रेमिका के तारीफ़ का पुल बाँधते समय भले किसी मायावती को मोनालिसा कहना पड़े या ममता को माधुरी ये सबकी चिंता मुझे उस नाजुक सी उम्र में करनी पड़ती थी....
प्रलय नाथ गुंडा स्वामी की सगी बहन जैसी दिखने वाली लड़की के  रूप लावण्य के बखान में ये बताना पड़ता था कि
"तुम सड़ी हुई जलेबी की तरह नहीं एकदम ताजा रसदार लौंगलता की तरह लगती हो....चलती हो तो धरती नहीं हिलती ऐसा प्रतीत होता है मानों बिरजू महराज झपताल की आमद प्रस्तुत करने जा रहें हों..तुम अमरीशपुरी की तरह नहीं बिल्कुल काजोल जैसी हंसती हो.....तुम्हारा ये शाहरुख खान किसी दिन बैलगाड़ी के नीचे लेटकर जान दे देगा मेरी जान....आई लव यू"
फिर तो साहेब कैसे पत्र को सकुशल जगह तक पहुँचाया जाए इसका भी लोड मेरे ही कपार पर था....अलग बात है की पहली बार पिंकी को खत देना था तो उसकी मम्मी को दे दिया कि "पिंकी को दे देना पूरुब टोला के  पप्पू ने दिया है..फिर पता नहीं पिंकी और पप्पू का क्या हुआ....पर मेरी धुलाई सर्फ एक्सल लगा के हुई.....उस दिन ज्ञात हुआ कि प्रेम करना और प्रेम पत्र लिखना दोनों इस देश में गैर कानूनी काम है...और इस गैर कानूनी काम में सहयोग करने पर आईपीसी कि वो धारा लगती है जिसमें घर वाले चप्पल और जूता से मारते हैं....
लेकिन साब जी...अक्सर लगता है कि मेरे लेखकीय गुण का प्रार्दुभाव वहीं से  हुआ हैं
वो दौर याद आता है तो खूब हंसी भी आती है और खुद की मासूमियत पर तरस भी...
उस 1g के जमाने में   कब किसी राह चलती पिंकी के प्यार में किसी पप्पू का केमिकल लोचा  उलझ जाए ये ठीक नही था .
प्यार में आदमी पप्पू हो जाता है...फिर जेठ के दुपहरिया में पुल पर खड़े होकर लम्बा इतंजार करना.....अँखियों से दिल का हाल समझाते समझाते.जताते जताते एक आध साल तो बीत ही जाते थे...कंफर्म करना पड़ता था की देखकर हँसने पर हँसती है की नहीं...गर हँसती है तो खत कब लिखा जाये..उसमें क्या लिखा जाये कि मामला उधर स्वीकार्य हो जाय...उसकी गली में फेंका जाय की छत पर  या उसकी सहेली को दिया जाये.....बड़े चोंचले थे........तीस पर लौंडे का आधा प्यार तो तभी खत्म हो जाता  कि कहीं पकड़ा गए तो घर वाले लाठी पर जमी धूल को उसकी पीठ पर साफ़ देंगे....इज्ज़त का ईंधन जलकर धुंआँ -धुआँ हो जायेगा।
थोड़ी हिम्मत बढ़ाने पर ये चिंता कि खून से लिखे की स्याही से? इसलिए उस समय के प्रेम पत्रों के मजमून इसी टाइप के शेर से स्टार्ट होते थे...
लिखता हूँ खून से स्याही न समझना
आपसे करता हूँ प्यार बेवफाई न समझना।

उस वक़्त पढ़ने वाला भी आँख से नही दिल से पढ़ता था......पत्रों में बार बार यही दोहराया जाता कि मैं तुम्हे जान से ज्यादा प्यार करता हूँ....और तुम ही मेरी जान हो.....उस बालावस्था में मुझे बड़ा वाला कनफ्यूजन क्रिएट  हो जाता कि साला ये असली जान कौन है..?
फिर कुछ महीने बाद  बोध हुआ की अगिया तो दोनों तरफ ही लगती है..ये अलग बात है  की लौंडे बेचारे पहले बदनाम हो जातें हैं.... इसका तब ज्ञान हुआ जब ,जबाबी खत चोरी से खोल के पढ़ा....जिसमें किसी ज्योति ने अपने दीपक को प्यार के अँधेरे में बैठकर लिखा था..
"सोने की साइकिल कलम का पहिया
हाय मेरे राजा मिलोगे कहिया" ?
तब तो पढ़कर आह निकल गयी....
दीपका ने भी मुझसे कहा की लिख दो "शनीचर को आठ बजे राति खाने मातादीन राई के टिबुल पर आना....."
हमने लिख दिया इस अंदाज में मानों गनेस जी वाल्मीकि जी के सामने बैठकर जनक वाटिका प्रसंग लिख रहें हों।
लेकिन  ये भी समझ नहीं थी कि ई साला रात को आठ बजे कौन सा पेयार होता है.....?
फिर पता न ज्योति और दीपक ने आठ बजे कौन सा प्यार किया...
लेकिन ये जरूर पता चला कि अब ज्योति का घर से बाहर आना जाना बन्द हो गया है..
सो अब खतों के शेर ग़हरिले भाव वाले हो गए..
"आज रविवार है मैं कपड़ा धो रही हूँ
साजन तेरे याद में छुप छुप के रो रही हूँ"
फिर हमेशा हंसने वाले दीपका को इतना मुरझाये मैंने कभी नहीं देखा...उहो खूब रोया....
और आँशु पोछकर कहा की लिख दो अतुल...
"टूटी हुई सुई से कढ़ाई नहीं होती है
डार्लिंग तेरे याद में पढ़ाई नहीं होती है"
तब पता चल की ओ......साला प्यार में रोया भी जाता है..
ऐसे ऐसे  किस्से हैं की आज उपन्यास लिख दूँ।
हाँ मैंने कभी किसी को अपनी ओर से खत नहीं लिखा...क्योंकि 2g के दौर में जवान हुआ..तब हाथों हाथ मोबाइल हो गए थे...
लेकिन जब भी इन खतों को पढ़ने पढ़वाने और लिखवाने वालों के चेहरे याद करता हूँ तो बड़ा अफ़सोस सा हो जाता है.....वो लौंडे प्रेमिका का पत्र पाकर इस अंदाज में उछलते थे मानों रियो ओलम्पिक का लम्बी कूद में भारत का प्रतिनिधित्व यही करेंगे...
वो खत को तकिये के नीचे रखकर सोना...सामने वाली जेब में रखकर बार बार पढ़ते हुए बेवजह हंसना....खत के इंतजार में घण्टो खड़े रहना.. अब दुर्लभ सा हो गया है।
वो जमाने नहीं आएंगे...हम चाहकर भी नहीं जा सकते न ही जाना उचित है....लेकिन इस whats app और फेसबुक के जमाने में.वो बेचैनीयाँ खत्म हो चुकी हैं....कहाँ से कहाँ आ गए..... सोचने पर लगता है अब कितनी सुविधा है....पर  अब वो शिद्दत और सदाकत मर गयी है...
आज कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को रोमांटिक सा मैसेज भेजे तो प्रेमिका शक्ति कपूर जैसा मुंह बनाकर कहेगी...
"पहले ये बतावो की तुम्हें किसने भेजा था"?
लो अब जज़्बात भी नकली लगने लगें हैं..उसका दोष भी नहीं....लौंडा एक ही साथ एक ही मैसेज को 28लोगों को फॉरवर्ड कर देता है.....क्या करे।
अब न वो खत  है और न ही वो प्रेमी... सब कुछ इतना फास्ट हो गया है की..साल भर में दो दो चार चार ब्रेक अप तो हो ही जातें हैं..
लौंडे प्रेम कहीं और करते हैं...आई लव यू कहीं और बोलते हैं...आर्गेज्म कहीं और महसूसते हैं...लड़कियां भी ये बताने में शान समझती हैं की कितने लौंडे उनके प्यार में पागल होकर जलेबी छान रहें हैं...
इस प्रेम के संकीर्ण काल में प्यार महज प्यार नहीं व्यापार हो गया है और आई लव यू महज जुमला।
कभी महान चित्रकार वान गॉग ने कहा था की "प्रेम जीवन का नमक है" ओशो कहतें हैं.."प्रेम आत्मा का भोजन है"
लेकिन "हाफ गर्लफ्रेंड" को सिरहाने रखकर सोने वाली पीढ़ी को देखकर समझ में नहीं आता की इस भोजन में नमक कितना है।।
अरे आज प्रेम में प्रेम को बचा लेना ही बड़ी उपलब्धि होगी.. बस इसके लिए खुद ही सुधरना होगा क्योंकि इसको बचाये रखने के लिए कोई एप्प और कोई साफ्टवेयर नहीं आयेगा.. याद रखना होगा की इमोशन सेव नहीं किये गए तो रिलेशन अपने आप डिलीट हो जाएंगे।

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