Tuesday, 11 August 2015

पुल पार करने से नदी पार नहीं होती...

"पुल पार करने से नदी पार नहीं होती"
सच कहा है किसी ने....
आज यूँ ही पार करते वक्त सोचता रहा था आदमी का नदी से कितना पुरातन सम्बन्ध है ...हमारी भारतीय संस्कृति की विशेषता ही है कि नदियों के जीवनदायिनी होने के कारण ही हम उन्हें नदी नहीं माँ कहते हैं...जिस माँ के किनारे न जाने कितनी संस्कृतियां पैदा हुई और ज़िंदा हैं.... उस माँ शब्द को पार पाने के लिए अभी कोई पुल नहीं बना...आधुनिकता जब अपने शैशवास्था में थी..बिजली,पानी,सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव था..तब लोग इन्हीं नदी रूपी माँ के आँचल में जीवन यापन करते थे...नगर नदियों के किनारे बसते थे......तभी तो गंगा-यमुना-सरजू से लोक मानस का गहरा लगाव आज भी है..नदियां हर सुख दुःख की साझीदार हैं.....पैदा होने से  लेकर मरते समय तक लोग नदियों से जुड़े रहते हैं।....हमारे यहाँ बियाह में  किसी को निमंत्रण कार्ड  देने से पहले सभी देवता-पीतर को आमंत्रित किया जाता है....शादी के दिन डीहबाबा,काली माई से लेकर से लेकर गंगा माई तक को बुलाया जाता है......लोक  में  एक से बढ़कर एक नदी गीत हैं...मातृत्व  सुख से वंचित स्त्रियां इस माँ के  किनारे ही अपना आँचल फैला कर खूब रोती हैं....नदी और स्त्री के बीच एक कलेजा हिलाने वाला करुण सम्वाद उभर कर आता है.....एक जगह स्त्री रोते हुए कहती है..
"गंगा माई के ऊँची अररिया तिरियवा एक रोवेली हो..
ए गंगा मइया अपने लहर मोहे दिहतू त हम धंस मरित हो....
यहाँ  गंगा मइया पूछती हैं...."किया तोर ए तिरिया नइहर दुःख  अउर ससुर दुःख हो.....
ए तिरियां किया तोरा कंता विदेस कथिय दुःखवा रोवेलू हो....."
मने , क्या हुआ कि रो रही हो....नइहर दुःख है कि ससुराल या पति परदेस चला गया......?
स्त्री कहती है...."नाही हमार ए गंगा मइया नइहर दुःख नाही ससुर दुःख हो....ए गंगा मइया नाही हमार कंता विदेस कोखीय दुखवा रोवेनी हो......
हे गंगा मइया !  मुझे न नइहर दुःख है न ससुराल , न ही मेरे पति विदेश हैं..मेरी कोख सूनी है आजतक इसलिए रो रही हूँ........सम्वाद के अंत में स्त्री को चुप कराकर गंगा माँ उसे संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देती हैं....एक सुखद अंत होता है तब लगता है कि लोकगीत में  स्त्रियों की आवाज ज्यादा क्यों है.....इस आत्मा के संगीत से पता चलता है कि स्त्री और नदी की गहराई में एक साम्यता है.....वही करूणा , वही सम्वेदना जिसके कारण स्त्री और नदी एक दूसरे के पर्याय हैं....तमाम गीत और संस्कार नदी रुपी माँ के किनारे ही सम्पन्न होते हैं....जन्म  लेकर दाह संस्कार तक हम जुड़े रहते है....सिंचाई से लेकर हर साल आने वाली विकराल बाढ़ तक जब यही जीवनदायिनी विनाशक रुप ले लेती है....
आज भी  देश भर में बाढ़ से न जाने कितने जूझ रहें हैं..लाखोँ बेघर हैं.....हजारों प्लास्टिक डालकर कहीं  आशियाना बनाये हैं......रोजी रोजगार से ज्यादा उन्हें अपने जान की चिंता है......वर्षा जब जब जब होती है वे थर थर कांपते हैं......काश ! एक पुल होता उनके यहाँ भी....अपने संजोये अरमानों को पानी-पानी होने से बचा लेते...पुल पार करते और किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाते...लेकिन धन्य हैं वो पानी से घिरे हुए लोग जिनके धैर्य का बाँध गंगा पर बने बांधों से भी ज्यादा मजबूत है...हर साल बाढ़ आती है और हर साल गंगा माई तबाही मचाकर चली जाती है...हर साल वातानुकूलित कमरों में बैठकर बिसलेरी पीते कुछ लोग बाढ़ नियंत्रण का बजट बनाते हैं..कहीं हर साल कुछ लोग हेलीकाप्टर में बैठकर बाढ़ का हवाई जायजा भी लेते हैं...हर साल हमारे बलिया जिला के जगदीशपुर ,नरदरा  जैसे  गाँवों से सटे गंगा किनारे के कई रमेसर अपना घर उजाड़ते हैं....ये कोई नई बात नहीं उनके लिए - ये तो हर साल होना है , पाई-पाई जोड़कर घर बनाने वाले रमेसर रात भर जगकर गंगा की कटान देखते हुए कलेजे पर  पत्थर रखकर घर छोड देतें हैं....इस त्रासदी ने अब परम्परा का रूप ले लिया है..सब जानते हैं कि ये तो हर साल ऐसे ही होता है..कोई नई बात नहीं...सोचता हूँ आदमी अपना घर उजाड़ते वक्त पत्थर का  हो जाता होगा न..ईंट की दीवाल तोड़ने से पहले सपनों की दीवाल को तोड़ना पड़ता होगा....न जाने कितनी बार हाथ कांपते होंगे...लेकिन आदमी कितना मजबूत है कितना क्रूर है और कितना दयालु भी है..वाह .ये शोध का विषय है।
यहां रमेसर को न हेलीकॉप्टर में बैठकर घूमने वालों से दिक्कत है..न एसी में बैठकर बिसलेरी पीकर बाढ़ नियंत्रित करने वालों पर भरोसा. वो तो बस अपनी गंगा मइया को गोहरातें हैं...की "रहम करो माँ...इस संकट से उबारो , जीवन दायिनी हो तुम , ये संहारक रुप छोडो...कातिक में पीठा और कराह ,चूड़ी,टिकुली,सेनुर के साथ अक्षत  चढ़ाकर बाजा बजवायेंगे......".
तभी तो हिम्मत नहीं हारते और इस माँ के सहारे चारों ओर पानी के बीच भी अपने पशुओं ,बेजुबानों की रक्षा के लिए चारा खोज ही लातें हैं...और बता देते हैं कि लाख कुछ भी हो जाय...वो मनुष्य बने रहेंगे..भले भगवान ने उन्हें इतना गरीब बना दिया तो क्या....उन्हें उनसे शिकायत नहीं जो गाँव छोड़कर शहर में बस गये......उनके धैर्य के बाँध में  मिर्जापुर के पत्थर लगें हैं....जब मुसीबत को गले लगा लिया तो डरना क्या ?
हम मंगल पर जरूर चले गए...लेकिन हर साल इस अमंगल से बचने का कोई ठोस उपाय क्यों नहीं हो पाता.?..न जाने कितने असमय काल कवलित हो जातें हैं...कितने बेजुबान मारे जातें हैं...उनके लिए कोई सर्वेक्षण कोई उपाय की खतरे के निशान से पहुंचने से पहले ही उनका सुरक्षित इंतजाम कर दिया जाये....उनके जानवरों के लिए कोई मुक्कमल ब्यवस्था की जाए।
कब सोचेंगे वो एसी में बैठकर बाढ़ नियंत्रित करने वाले...?
उन्हें कब पता चलेगा कि अभी ऐसे ही देश भर में  न जाने कितने रमेसर,सुरेसर इस हालात में  जीने के लिए अभिशप्त होंगे जिन्हें आज भी सरकारी तंत्र पर नहीं बल्कि गंगा माई पर ज्यादा भरोसा है।
उन सभी रमेसर  सुरेसर को सलाम है उनके अरमानों का पुल सपनों की मंजिल तक पहुंचे और इस आंधी तूफ़ान और बाढ़ में उनके धैर्य का  बाँध न टूटे.....
©Atul Kumar Rai

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