Thursday, 13 November 2014

मेला के रेला और रेल

कल बलिया से बनारस आते वक्त ट्रेन में जिला मोतिहारी बिहार
कि पचपन वर्षीय सुनैना देइ उनकी साठ वर्षीय बहीन...और पन्द्रह
बीस महिलायें....साथ में जिला बेगूसराय बिहार के कमला प्रसाद और
दो चार पचपन और साठ के बीच झूलते पुरुष..देह पर गरीबी और
अभाव से जंग लड़ रहे इनके फटे कपड़े....
पन्द्रह बीस जगह सुई धागा से सिले गये फटे बैग में टूटे हुए
बोतल...ठंडी के लिए साल ,दो चार कपड़े....चप्पल में ठुकी हुई
बेहिसाब किल...
इन सबके बावजूद सुनयना देई ने लाल रंग से अपना गोड़ रंगा है..माथे
पर खूब लाल रंग की बड़ी वाली बिंदी और लाल सिंदूर से मांग
भरा है...साड़ी कई जगह सिली गई है लेकिन उन्होंने मेले से
लायी चुड़ीयाँ भी पहनीं है
और धीरे से एक बीडी जलाकर, बुझाते हुए मुझसे पूछती हैं...ए बबुआ
बनारस के टीसन कब आई?
हम ट्रेन की अपार भीड़ से सर निकालते हैं..और बाहर देखकर बताते हैं
बस दू स्टेशन बाद चाची...
चाची इतनी खुश होती हैं मानो वो सद्भावना में नहीं हवाई जहाज पर
बैठी हों..और वो होनूलूलू पर लैंड ही करने वाला हो...
मुझे अंदाजा लग जाता है ये लोग कार्तिक पूर्णिमा पर बनारस नहाने
जा रहें हैं....
पांच मिनट बहुत गौर से सबको देखता हूँ...और इनकी मूर्खता पर
हंसता हूँ..की क्या पड़ी है इन्हें जो मरने जा रहें हैं...?
ये मासूम लोग वही हैं जो मेले ठेले में मची भगदड़ में सबसे पहले मौत
का शिकार हो जातें हैं....
तीस पर इनका उत्साह कितना हैरान करता है...मैं तीन साल
अस्सी घाट के बाद डेढ़ साल से दशास्वमेध के किनारे हूँ पर आज तक
नहाने की हिम्मत नहीं हुई...पर इसमें मेरा ही तो दोस है...आप
भला क्यों जाए नहानें ? अरे आप बुद्धिजीवी आदमी बनना चाहतें हैं
क्या अतुल बाबू ? दोनों एक साथ कैसे हो सकता है? तरस आती है
अपने पर
फिर तो आज सुबह उठकर देखता हूँ...सुनैना और कमला जैसे
ही ज्यादातर लोग नहाकर आ रहें हैं और नहाने जा रहें हैं....आप अपने
बुद्धिजीवी होने का दम्भ भरते हुए इनकी निरा मूर्खता पर दो चार
मिनट हंस सकतें हैं.....
पर सच तो यही है साहेब की ये त्यौहार स्नान और धार्मिक मेले आज
इन्ही के कारण ज़िंदा हैं...
मुझे नहीं पता कितना पुण्य मिलता है लेकिन वो ख़ुशी जरुर मिलती है
जिसके लिए आदमी हाय हाय किया हुआ है. .अमीरों के खुश होने के
पचहत्तर साधन हैं ..पर ये लोग गरीबी और अभाव से जद्दोहद में
यहीं आकर थोड़ा सुकून पातें हैं......
आप किसी वातानुकूलित माल में जाकर आनंदित हो सकतें हैं ...लेकिन
इनको इसी मेला की गुरहि जिलेबी में सुख तलाशना है.....
इसी मेला में आज तो रजा बनारस लौकिक में अलौकिक को चरीतार्थ
करेगा ।
कारण आज देवों की दीवाली यानी देवदीपावली भी है....करीब इक्यावन
लाख दीपों से दुनिया के सबसे प्राचीनतम शहर के एक सौ अस्सी से
ज्यादा घाट सजेंगे....
कहतें हैं आज ही के दिन भगवान शिव ने त्रिपुर नामक असुर का संहार
किया था....बहुत साल तक कुछ श्रद्धालु महिलायें इस दिन दीप
जलाकर लौट जातीं थीं....फिर इंदौर की रानी अहिल्या बाई के
द्वारा 1720 के आस पास पंचगंगा घाट पर बनवाये दीप स्तम्भ में
एक हजार दीप जले....और धीरे धीरे सारे घाट जगमगाने लगे...और इक
ऐसी परम्परा ने जन्म लिया की दुनिया भर के कोने कोने से लोग आ
खींचे चले आतें हैं...
आज ही के दिन हमारे बलिया जिला में एतिहासिक ददरी मेला शुरू
होता है.....
उधर बिहार में सोनपुर मेला भी.....
हम आज से पचास साल पहले होते तो अभी अभी कुतुबपुर में
भिखारी ठाकुर रेंगनी पर अपनी धोती सुखाकर टांग रहें
होते .....ताकि आज मेला में अपनी नाच मंडली के साथ 'गंगा स्नान'
नाटक खेलने जा सकें......
और मंच पर सुनयना और कमला जैसे लोग जब उनके मुंह से
सुनते.तो खूब ठठाकर हंसते..."अरे मेला जइहे त बचा के देखिहे
कवनो बैल के गोड़ मत कंड़ीहे"

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